Introduction
Raj Kapoor plays Hiraman, a bullock-cart driver of idealistic values, who makes three solemn vows—or kasams: never to transport illegal goods, never to carry bamboo again, and finally, never to carry a nautanki dancer. That dancer is Hirabai (Waheeda Rehman), with whom he shares a tender, emotionally charged journey. Their relationship, forged on the road to a village fair, becomes the film's soul—an unspoken love restrained by society's prejudices against Hirabai's profession. It's a tale of purity and quiet resistance set against the rustic rhythms of rural India.
The supporting cast includes Dulari as Hiraman's bhabhi, Iftekhar as Thakur Vikram Singh, Keshto Mukherjee, A.K. Hangal, Asit Sen, C.S. Dubey, Krishan Dhawan, and many others, including a brief appearance by Shailendra himself.
Shailendra initially planned to shoot Teesri Kasam in Bihar's Terai region, but concerns over dacoits led the crew to Igatpuri near Nasik. Outdoor scenes were filmed in Aurahi Hingna (Araria district, Bihar), Bina (near Bhopal), Powai Lake, and Mohan Studios, while indoor sequences took place at R.K. Studio, Shree Sound, and Kamal Studio in Mumbai. Raj Kapoor suggested a happier ending, with Hiraman and Hirabai uniting, but it was rejected. Subrata Mitra handled cinematography; choreography was by Lachchu Maharaj and Rama Devi, with nautanki guided by Shankar-Shambhu. A.K. Hangal's role was mostly cut in the final edit.
With music composed by Shankar–Jaikishan, the soundtrack is a rich tapestry of folk melodies and poetic lyrics. Songs like Sajan Re Jhoot Mat Bolo (Mukesh), Chalat Musafir (Manna Dey), Aa Aa Bhi Jaa (Lata Mangeshkar), and Maare Gaye Gulfaam (Lata) evoke deep emotional resonance. But it was Asha Bhosle's Paan Khaye Saiyaan Hamaaro that captured the public imagination and endures as a classic.
The film's visual poetry owes much to cinematographer Subrata Mitra. Dialogues were penned by Renu himself, with screenplay by Nabendu Ghosh (of Devdas, Sujata, and Bandini fame). Kapoor famously charged only one rupee for his role, believing in the story's heart, though he later criticized Bhattacharya's direction as self-indulgent.
Originally, Mehmood and Meena Kumari were to play the leads. Basu Bhattacharya was keen on a more naturalistic performance style, but the decision to cast Waheeda Rehman was likely due to a combination of factors, including the director's preference for a more naturalistic performance style and the film's need for a fresh, less established pairing with Raj Kapoor.
Despite critical acclaim and the National Film Award for Best Feature Film (1967), Teesri Kasam was a commercial failure—leading to Shailendra's financial ruin and, tragically, his premature death.
Over time, however, the film earned its due place as a classic of Indian cinema. It won accolades at the Bengal Film Journalists' Association Awards, Filmfare, and was featured at the Moscow International Film Festival. A chapter titled Teesri Kasam Ke Shilpkar Shailendra is now part of the CBSE Class 10 Hindi curriculum—a testament to its enduring cultural legacy.
फ़िल्म में राज कपूर ने अपनी शहरी छवि से बिल्कुल अलग जाकर हीरामन नामक एक गँवई और भुज्ज देहाती गाड़ीवान का किरदार निभाया है। हीरामन एक भोला गाड़ीवान है जिसे आने-पैसे और दुनियादारी की ज़रा भी समझ नहीं। फ़िल्म की शुरुआत में ही वह दो 'कसमें' खाता है, एक कि वो कभी भी दो नंबर का माल अपनी बैलगाड़ी में नहीं ले जायेगा और दूसरी कि गाड़ी में कभी बांस नहीं ढोयेगा। लेकिन कहानी की तीसरी कसम अन्त में आती है और वो है कि कभी किसी नौटंकी वाली बाई को अपनी गाड़ी में नहीं बिठाएगा। इन्हीं तीनों कसमों के बीच हीरामन और हीराबाई की पंख सी कोमल प्रेमकहानी गुँथी है। वहीदा रहमान का निभाया हीराबाई का किरदार यहाँ एक नौटंकी में नाचनेवाली बाई का किरदार है जिसे गाँव के मेले तक लेकर जाने की ज़िम्मेदारी हीरामन और उसकी बैलगाड़ी पर है। गाँव-घर से मेले तक के इस सफ़र में हीरामन और हीराबाई दोनों के बीच एक नाज़ुक अबोला नेह का रिश्ता पनपता है। यहाँ प्रेम की एक कोमल मौन अभिव्यक्ति है, बस इतना कि नायिका नायक को 'मीता' कहकर बुलाती है। लेकिन फिर इस कोमल नेह के रिश्ते के बीच समाज की ओछी नज़रें आ जाती हैं। हीराबाई और हीराबाई यहाँ दो भिन्न दुनियाओं के प्रतिनिधि किरदार हैं। एक पतनशील जड़ सामंती व्यवस्था को पूँजीवाद के साथ आये रुपए-पैसे के रिश्ते सिरे से बदल रहे हैं। हीरामन का भोला मन इसे समझने पाने में असमर्थ है। कथानक में आई महुआ घटवारिन की कथा और संवाद “महुआ घटवारिन को सौदागर ने खरीद लिया है गुरुजी” इसका संकेत सूत्र जैसा है।
तीसरी कसम भारतीय ग्रामीण जीवन की सच्ची तस्वीर ख़ीचती है। न उसे कुरूप बनाती है और न उस पर किसी किस्म का रंगरोगन करती है। जैसा रेणु अपने उपन्यास 'मैला आँचल' की भूमिका में लिखते हैं, “इसमें फूल भी हैं, शूल भी, धूल भी है, गुलाब भी, कीचड़ भी है, चंदन भी, सुंदरता भी है, कुरूपता भी। मैं किसी से दामन बचाकर निकल नहीं पाया।” कुछ हद तक यही 'तीसरी कसम' के परिवेश और कथानक के बारे में भी कहा जा सकता है जिसे शैलेंद्र और बासु भट्टाचार्य की जोड़ी ने फ़िल्म में बखूबी बरकरार रखा है।
फ़िल्म में अन्य प्रमुख भूमिकाओं में अभिनेत्री दुलारी ने हीरामन की भाभी की भूमिका निभाई है जबकि इफ़्तेख़ार ठाकुर विक्रम सिंह की भूमिका में हैं। फ़िल्म में केश्टो मुखर्जी, ए. के. हंगल, असित सेन, सी. एस. दुबे एवं कृष्ण धवन सहायक भूमिकाओं में हैं और एक जगह स्वयं शैलेन्द्र भी एक छोटी सी भूमिका में नज़र आते हैं।
निर्माता शैलेन्द्र की इच्छा थी कि इस फ़िल्म की शूटिंग बिहार के नेपाल से लगते उसी तराई वाले इलाके में की जाये जहाँ का परिवेश इस कहानी में मौजूद है। खुद शैलेंद्र का पैतृक निवास बिहार था और वह इस परिवेश से एक आत्मीय जुड़ाव महसूस करते थे। लेकिन उस समय उस क्षेत्र में डकैतों का आतंक बहुत था और इसी के चलते फ़िल्म यूनिट को शूटिंग के लिए नासिक के पास ईगतपुरी जाना पड़ा। फिर भी फ़िल्म के कुछ आउटडोर दृश्य बिहार के अररिया-फ़ारबिसगंज इलाके के उसी औराही हिंगना में फ़िल्माए गए जो कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु की कथाभूमि थी। फ़िल्म की अन्य शूटिंग भोपाल के पास बीना में, मुंबई में पवई झील और मोहन स्टूडियो में, आर. के. स्टूडियो में, श्री साउंड और कमल स्टूडियो में हुई। फ़िल्म के नायक राज कपूर ने सुझाव दिया था कि फ़िल्म का अंत सुखद बनाया जा सकता है जिसमें आखिर में हीरामन और हीराबाई मिल जाते हैं, लेकिन शैलेंद्र मूल कथा की आत्मा से समझौता नहीं करना चाहते थे। वे इनकार हो गए। फ़िल्म में सिनेमैटोग्राफ़ी सुप्रसिद्ध कैमरामैन सुब्रत मित्रा की थी और नृत्य निर्देशन का ज़िम्मा लच्छू महाराज और रमा देवी ने संभाला था। नौटंकी शैली के नृत्यों का निर्देशन शंकर-शंभू द्वारा किया गया था। फ़िल्म में ए. के. हंगल की भूमिका संपादक की मेज़ पर क़रीब-क़रीब पूरी ही काट दी गई थी।
तीसरी कसम के लिए संगीत शंकर–जयकिशन ने तैयार किया था। फ़िल्म में बिहार की आँचलिक लोकधुनों का सुन्दर काव्यात्मक इस्तेमाल मिलता है। प्रामाणिकता के लिए 'लाली लाली डोलिया में' जैसे लोकगीत जिनका ज़िक्र कहानी में आया था उन्हें शैलेंद्र ने फ़िल्म में गीत के बतौर इस्तेमाल किया। मुकेश का गाया 'सजन रे झूठ मत बोलो', मन्ना डे का गाया 'चलत मुसाफिर', लता मंगेशकर की आवाज़ में 'आ आ भी जा' और 'मारे गए गुलफ़ाम' जैसे गीतों ने फ़िल्म को गज़ब की प्रामाणिकता और भावनात्मक गहराई प्रदान की। सबसे यादगार रहा आशा भोंसले का गाया गीत 'पान खाए सैंया हमारो' जिसे ऐसी लोकप्रियता हासिल हुई कि वो भारतीय सिनेमा के क्लासिक गीतों की सूची में शामिल हो गया।
फ़िल्म की कवितामय दृश्यभाषा का श्रेय इसके सिनेमैटोग्राफ़र सुब्रत मित्रा को जाता है। फ़िल्म के लिए संवाद स्वयं कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु ने लिखे थे और पटकथा देवदास, सुजाता और बंदिनी जैसी फ़िल्मों की पटकथा लिखने वाले नबेंदु घोष ने तैयार की थी। शैलेंद्र को 'कविराज' की उपाधि से संबोधित करनेवाले उनके अनन्य मित्र राज कपूर ने यह फ़िल्म मात्र एक रुपये में करना स्वीकार किया था। राज कपूर को फ़िल्म की मूल कहानी में गहरा विश्वास था, हालाँकि बाद में उन्होंने बासु भट्टाचार्य के निर्देशन को खुद में ही डूबा हुआ बताकर आलोचना की थी।
आरंभ में इस फ़िल्म में मुख्य भूमिकाएँ निभाने के लिए महमूद और मीना कुमारी पर विचार किया गया था। निर्देशक बासु भट्टाचार्य कलाकारों से एक गैर-नाटकीय स्वाभाविक अभिनय शैली की उम्मीद कर रहे थे और वहीदा रहमान का हीराबाई की भूमिका में चयन कुछ हद तक इस बात से भी प्रभावित था। इसके साथ पर्दे पर राज कपूर के संग एक नई जोड़ी पेश करने की सोच भी काम कर रही थी।
हालाँकि तीसरी कसम को आलोचकों ने भूरि-भूरि प्रशंसा मिली और अगले वर्ष के राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों में साल 1967 की सर्वश्रेष्ठ फ़ीचर फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला, लेकिन यह फ़िल्म व्यावसायिक रूप से घोर असफल रही। इसकी नाकामयाबी ने निर्माता शैलेन्द्र को भीतर से तोड़ दिया। वे गंभीर आर्थिक संकट में घिर गए थे। उनके असमय निधन में तीसरी कसम की इस नाकामयाबी की एक त्रासद भूमिका रही है।
किन्तु वक्त बीतने के साथ यह फ़िल्म एक क्लासिक भारतीय फ़िल्म के रूप में प्रतिष्ठित हुई। इसे बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन और फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार से नवाज़ा गया और 'मास्को अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव' में भी प्रदर्शित हुई। आज भी यह फ़िल्म शैलेन्द्र की स्मृति में सदा याद की जाती है। उत्तर भारत की सांस्कृतिक ज़मीन को समझने में इस फ़िल्म का स्थायी महत्व बन पड़ा है। सीबीएसई कक्षा 10 की हिन्दी पाठ्यपुस्तक में प्रहलाद अग्रवाल का लिखा 'तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र' शीर्षक से अध्याय शामिल किया गया है, जिसके साथ इस फ़िल्म की और इसके निर्माण में कोई कमी न रहे इसके लिए संघर्षरत कवि शैलेंद्र की स्मृति अमर हो गई है।