Aarohan1982
Introduction
As one of the key figures in the Parallel Cinema movement, Shyam Benegal was instrumental in shaping the New India Cinema. He earned numerous accolades for his body of work, including 18 National Film Awards, a Filmfare Award, and a Nandi Award. In 2005, he was honored with the prestigious Dadasaheb Phalke Award, India's highest cinema honor. Earlier, in 1976, he received the Padma Shri, followed by the Padma Bhushan in 1991 for his contribution to Indian cinema. His quartet of films—Ankur (1973), Nishant (1975), Manthan (1976), and Bhumika (1977)—is widely credited with defining the success of New India Cinema in the 1970s and early 1980s.
Arohan remains a politically charged and socially relevant film, exploring the complexities of India's caste system and class struggles. It won the 1982 National Film Award for Best Actor (Om Puri) and Best Feature Film in Hindi, further cementing Shyam Benegal's reputation as one of India's finest filmmakers.
फ़िल्म की कहानी 1960 के उथल-पुथल से भरे दशक में स्थित है। कहानी के केंद्र में एक गरीब किसान है जो क्रूर और चालाक ज़मींदार के अत्याचार तले पिसा जा रहा है। फ़िल्म की कहानी उस दौर में हुए नक्सलवाद के उभार को भी चित्रित करती है। शमा ज़ैदी की लिखी और गोविंद निहलानी के छायांकन से रची आरोहण भारत की ज़मींदारी प्रथा के भीतर मौजूद गहरी असमानताओं को अपना विषय बनाती है। सामाजिक गैर-बराबरी और अन्याय किस तरह इंसानी जीवन की बलि माँगते हैं, फ़िल्म का यथार्थ अपनी पूरी सच्चाई के साथ दिखाने में
हिचकता नहीं।
श्याम बाबू समांतर सिनेमा आन्दोलन के सबसे प्रमुख हस्ताक्षर रहे और भारत में नए उभरते इस सिनेमा को आकार देने में उनकी ख़ास भूमिका रही। अपने शानदार सिनेमाई करियर में उन्हें 18 राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार, एक फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार और एक नंदी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। साल 2005 में उन्हें भारत के सर्वोच्च सिनेमा सम्मान 'दादासाहेब फाल्के पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। भारतीय सिनेमा में योगदान के लिए उन्हें इससे पहले सन् 1976 में पद्म श्री और सन् 1991 में पद्म भूषण से सम्मानित किया जा चुका था। उनके निर्देशकीय़ करियर की शुरुआती कुछ फ़िल्में जैसे - अंकुर (1973), निशांत (1975), मंथन (1976) और भूमिका (1977) यादगार रही हैं और इन्हें 1970 के दशक के शुरुआती वर्षों में उभरे 'समांतर सिनेमा आन्दोलन' की कामयाबी का काफ़ी बड़ा श्रेय दिया जा सकता है।
आरोहण एक राजनैतिक तौर पर सचेत फ़िल्म है और इसकी प्रासंगिकता आज के दौर में भी बनी हुई है। यह भारत की जाति व्यवस्था में मौजूद गैर-बराबरी और उससे उपजे वर्ग संघर्ष का सच्चा चित्र खींचती है। आरोहण के लिए ओम पुरी ने वर्ष 1982 का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार जीता और फ़िल्म को सर्वश्रेष्ठ हिन्दी फीचर फ़िल्म होने का भी गौरव हासिल हुआ। श्याम बेनेगल एक प्रतिष्ठित फ़िल्मकार के रूप में और बेहतर तरीके से स्थापित हो गए।