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Vidyapati1937

Vidyapati (1937): featured artwork

Introduction

Vidyapati (1937), directed by Debaki Bose for New Theatres, is a landmark Bengali biopic about the Maithili poet and Vaishnava saint, Vidyapati. Released in both Bengali (Bidyapati) and Hindi (Vidyapati), the film starred Pahari Sanyal in the titular role, with a notable ensemble cast including Kanan Devi, Prithviraj Kapoor, Chhaya Devi, Leela Desai, K. C. Dey, and Kidar Sharma.
The narrative centers on King Shiva Singha (Prithviraj Kapoor) and Queen Lakshmi (Chhaya Devi), who invite Vidyapati (Pahari Sanyal) and his companion Anuradha (Kanan Devi) to their court. The Queen becomes enamoured with the poet's verses and falls in love with him, leading to the King's emotional turmoil. As the King turns to Anuradha for solace, the Queen, consumed by guilt and despair, takes her own life. The tragic climax underscores the emotional depth of the story.
Kazi Nazrul Islam and Debaki Bose co-wrote the script and dialogues, weaving Vidyapati's sensuous poetry into the screenplay. The lyrics, seen as bold for the time, contributed to the film's widespread popularity. R. C. Boral's music, incorporating Western elements like the organ and piano, featured memorable songs performed by Kanan Devi, Pahari Sanyal, and K. C. Dey—making them instant classics.
Though titled Vidyapati, the film is remembered for Kanan Devi's outstanding performance as Anuradha, which became central to the film's success. Prithviraj Kapoor's portrayal was also praised, particularly by Filmindia's editor Baburao Patel.
The film was later referenced in Guru Dutt's Kaagaz Ke Phool (1959) as a tribute to the Studio Era. With its artistic direction, powerful music, and strong performances, Vidyapati remains one of Debaki Bose's finest cinematic achievements and a major box office success of 1937.
विद्यापति (1937) के निर्देशक देबकी बोस थे और इस फ़िल्म का निर्माण कलकत्ता के ऐतिहासिक 'न्यू थिएटर्स' के बैनर तले हुआ था। इस फ़िल्म की कहानी आरंभिक मध्यकाल के प्रसिद्ध मैथिली कवि और वैष्णव भक्ति संत विद्यापति के जीवन पर आधारित थी। 'न्यू थियेटर्स' की उस दौर की अन्य फ़िल्मों के अनुरूप इस फ़िल्म का निर्माण भी बांग्ला और हिन्दी भाषा में समान्तर रूप से हुआ था। यह फिल्म बांग्ला में इस फ़िल्म का नाम बिद्यापति और हिन्दी भाषा में विद्यापति रखा गया था। इस फ़िल्म में अभिनेता पहाड़ी सन्याल शीर्षक भूमिका निभा रहे थे। साथ में प्रमुख कलाकारों में कानन देवी, पृथ्वीराज कपूर, छाया देवी, लीला देसाई, के. सी. डे और किदार शर्मा जैसे अभिनेता शामिल थे।
फ़िल्म की कहानी राजा शिव सिंह (पृथ्वीराज कपूर) और रानी लक्ष्मी (छाया देवी) के किरदारों के साथ आगे बढ़ती है। यह दोनों शाही परिवार के वारिस कवि विद्यापति (पहाड़ी सन्याल) और उनकी संगिनी अनुराधा (कानन देवी) को अपने दरबार में आमंत्रित करते हैं। रानी लक्ष्मी राजमहल में विद्यापति की कविताओं से इतनी प्रभावित हो जाती हैं कि उन्हें प्रेम करने लगती हैं। इधर राजा शिव सिंह यह मालूम पड़ने पर घोर मानसिक संताप में डूब जाते हैं। संकट में पड़े राजा शिव सिंह कवि की संगिनी अनुराधा की संगत में शांति की तलाश करते हैं। इधर ग्लानि में डूबी और अपराधबोध से घिरी रानी लक्ष्मी अंततः आत्महत्या करने का फैसला करती हैं। फ़िल्म का त्रासद अन्त कथानक की भावनात्मक गहराई को और बढ़ाता है।
फ़िल्म की पटकथा और संवाद काज़ी नज़रुल इस्लाम और देबकी बोस ने मिलकर लिखे थे और विद्यापति की शृंगार रस से भरी कविताओं को कथानक में अच्छे से गूँथा गया था। फ़िल्म के गीतों में इस्तेमाल हुए विद्यापति के पद अपने कामुक शृंगार चित्रण के चलते उस दौर के लिए काफ़ी साहसी माने गए और इसने फ़िल्म को व्यापक लोकप्रियता भी दिलाई। फ़िल्म के लिए संगीत आर. सी. बोराल ने तैयार किया था जिसमें उन्होंने विदेशी वाद्ययंत्रों जैसे ऑर्गन और पियानो का भी इस्तेमाल किया। फ़िल्म का संगीत खूब लोकप्रिय हुआ और कानन देवी, पहाड़ी सन्याल और के. सी. डे के गाए गीत फ़ौरन ही क्लासिक बन गए।
हालाँकि फ़िल्म का नाम विद्यापति था और यह उनके किरदार पर आधारित थी, लेकिन फ़िल्म में सबसे ज़्यादा प्रशंसा अनुराधा के किरदार को कुशलता से निभाने के लिए कानन देवी ने बटोरी। यहाँ तक कि उनका यह किरदार ही फ़िल्म का मुख्य आकर्षण बन गया। पृथ्वीराज कपूर के अभिनय की भी विशेष सराहना हुई, ख़ासतौर पर 'फ़िल्मइंडिया' मैगज़ीन के सम्पादक बाबूराव पटेल ने उनकी अलग से तारीफ़ की।
बाद में इस फ़िल्म का उल्लेख गुरु दत्त की काग़ज़ के फूल (1959) में भी आता है, स्टूडियो सिनेमा के दौर को एक खोई हुई स्मृति के बतौर याद करते हुए। विद्यापति सन् 1937 की सबसे बड़ी व्यावसायिक कामयाबियों में से एक रही। अपने उत्कृष्ट कलात्मक निर्देशन, प्रभावशाली संगीत और सशक्त अभिनय के कारण विद्यापति निर्देशक देबकी बोस की श्रेष्ठतम रचनाओं में से एक गिनी जाती है।
Bose, Debaki (Director), Vidyapati, 1937 | Cyclostyled Lyrics Leaflet | CinemaEducation | 00517404
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