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Sargam1950

Sargam (1950): featured artwork

Introduction

Sargam (1950) was a classic family drama directed by P. L. Santoshi and featuring Raj Kapoor and Rehana in lead roles. The story revolves around Vinod (Raj Kapoor), a young man who falls in love with Bhairavi (Rehana), a talented singer. Their love faces various challenges, including societal pressures and familial expectations. The narrative explores themes of love, sacrifice, and the transformative power of music. Its stellar cast had Raj Kapoor as Vinod; Rehana as Bhairavi; Om Prakash as Seth Roopchand; David as Pandit Shiv Shankar; Radhakrishan as Babulal.
The film's music, composed by C. Ramchandra with lyrics by P. L. Santoshi, was a highlight. The soundtrack featured classical and contemporary compositions, with Lata Mangeshkar delivering memorable performances. Notable Songs included: Chhed Sakhi Sargam – A classical-based duet sung by Lata Mangeshkar and Saraswati Rane, highlighting the film's musical depth; Woh Humse Chup Hai a romantic ghazal-style duet by Lata Mangeshkar and C. Ramchandra; Main Hoon Alladin a playful and whimsical song featuring Lata Mangeshkar, Mohammed Rafi, and Chitalkar.
The film was a moderate box office success, earning approximately ₹85,00,000 gross and ₹48,00,000 net, making it the eighth highest-earning Indian film of 1950.
The moderate success of the film didn't affect Raj Kapoor's career who rose to prominence as both an actor and filmmaker in the late 1940s and early 1950s. Although he made his acting debut in 1947, it was his directorial debut Aag (1948), followed by the major success of Barsaat (1949), that firmly established his place in Indian cinema. His later films—especially Awara, Shree 420, and Sangam — cemented his reputation as a leading star and visionary director during the golden age of Indian cinema.
सरगम (1950) एक पारंपरिक किस्म की पारिवारिक कहानी पर बनी फ़िल्म थी। इस फ़िल्म का निर्देशन पी. एल. संतोषी ने किया था और इसमें राज कपूर और रेहाना मुख्य भूमिकाएँ निभा रहे थे। इस फ़िल्म की कहानी विनोद (राज कपूर) नामक एक युवा किरदार के साथ आगे बढ़ती है। विनोद को एक संभावनाओं से भरी प्रतिभाशाली गायिका भैरवी (रेहाना) से प्रेम हो जाता है। पर उनके प्रेम को सामाजिक दबाव और पारिवारिक आकाँक्षाओं से मिलकर बनी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। यह कहानी प्रेम और त्याग जैसे मूल्यों की बात तो करती ही है, यह संगीत के भीतर छिपी रूपांतरकारी ताक़त को भी अपनी कहानी का विषय बनाती है। फ़िल्म के प्रमुख पात्रों में सिनेमा के उभरते सितारे राज कपूर ने विनोद की भूमिका निभाई थी और अभिनेत्री रेहाना ने भैरवी की। फ़िल्म में ओम प्रकाश सेठ रूपचंद की भूमिका में थे और डेविड ने पंडित शिवशंकर का किरदार निभाया था। अभिनेता राधाकृष्णन फ़िल्म में बाबूलाल की भूमिका में नज़र आए थे।
सरगम फ़िल्म के लिए संगीत सी. रामचंद्र ने तैयार किया था और इसके लिए गीत लिखे थे खुद निर्देशक पी. एल. संतोषी ने। संगीत इस फ़िल्म की कहानी का एक अहम हिस्सा था और फ़िल्म की लोकप्रियता में उसने प्रमुख भूमिका निभाई। फ़िल्म के गानों में शास्त्रीय संगीत और समकालीन धुनों का सुंदर संयोजन देखने को मिला और लता मंगेशकर ने इस फ़िल्म के लिए कुछ यादगार गाने गाये। फ़िल्म के प्रमुख गीतों में छेड़ सखी सरगम जैसा युगल गीत शामिल था जिसमें लता मंगेशकर और सरस्वती राणे ने अपनी आवाज़ें दी थीं। यह फ़िल्म के संगीत को शास्त्रीय आयाम देता है। इसके साथ वो हमसे चुप हैं गीत था जो एक रोमांटिक किस्म की ग़ज़ल थी, जिसे लता मंगेशकर और सी. रामचंद्र ने साथ मिलकर गाया था। इसके साथ फ़िल्म में मैं हूं अलादीन जैसा चंचल और शोख़ गीत भी था जिसे लता मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी और चितलकर जैसे गायकों ने अपनी आवाज़ों से सजाया था।
इस फ़िल्म ने टिकट खिड़की पर औसत किस्म की कामयाबी हासिल की। फ़िल्म ने लगभग 85 लाख रुपए की कुल कमाई की, जिसमें से 48 लाख के करीब शुद्ध लाभ था। इस तरह यह सन् 1950 की आठवीं सबसे अधिक कमाई करने वाली भारतीय फ़िल्म बनी।
लेकिन इस फ़िल्म की औसत सफलता ने उस दौर के उभरते नायक और युवा फ़िल्मकार राज कपूर के करियर पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं डाला। 1940 के दशक के समाप्ति के वर्ष और 1950 के दशक के शुरुआती वर्ष अभिनेता और फ़िल्मकार की भूमिका में राज कपूर के सिनेमा उद्योग में आगमन और अपनी निर्देशित आरंभिक फ़िल्मों से ही धाक जमा लेने के वर्ष हैं। तब उनकी लोकप्रियता उफान पर थी। हालाँकि राज कपूर सन् 1947 में ही नायक की भूमिका में अभिनय की पारी शुरु कर चुके थे, लेकिन उनके निर्देशन के क्षेत्र में पड़े पहले कदमों आग (1948) और फिर बरसात (1949) की कामयाबी ने भारतीय सिनेमा में उनकी जगह को मजबूती से स्थापित किया। इसके बाद के दशक में आई उनकी फ़िल्में ख़ासकर आवारा (1951), श्री 420 (1955) और जिस देस में गंगा बहती है (1960) जैसी क्लासिक फ़िल्मों ने उन्हें भारतीय सिनेमा के स्वर्ण युग कहलाये जाने वाले पचास के दशक का हरदिलअज़ीज़ सितारा और निर्देशन के क्षेत्र में सर्वप्रमुख हस्ताक्षर बना दिया।
Santoshi, P.L. (Director), Sargam, 1950 | Cyclostyled Lyrics Leaflet | CinemaEducation | 00517612
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