Introduction
The film had a star-studded cast, with Dharmendra, Jackie Shroff, Shilpa Shirodkar, Anu Aggarwal, and Madhoo joining the ensemble. Yet, unlike its predecessor, Return of Jewel Thief failed to make an impact at the box office, a sharp contrast to the overwhelming success of Aashiqui (1990), which marked Anu Aggarwal's last major film release.
The plot revolves around the theft of the priceless Kohinoor diamond from an exhibition hosted by billionaire Vinay Kumar (Dev Anand), who faces the possibility of losing his jewellery store to the British government unless the diamond is recovered. Despite the gripping premise, which kept viewers guessing about the identity of the real jewel thief, the execution fell short in certain areas.
The music, composed by Jatin Lalit, was a significant let down despite contributions from renowned playback singers like Asha Bhosle, Abhijeet, Kumar Sanu, and Alka Yagnik. The compositions were largely forgettable, failing to capture the magic of the original's soundtrack.
फ़िल्म में इन दोनों दिग्गज अभिनेताओं के साथ धर्मेंद्र, जैकी श्रॉफ़, शिल्पा शिरोडकर, अनु अग्रवाल और मधु जैसे कई सितारा कलाकार काम कर रहे थे। फिर भी रिटर्न ऑफ़ ज़्वैल थीफ़ टिकट खिड़की पर किसी भी किस्म की कामयाबी हासिल नहीं कर सकी। यहाँ तक कि अपनी पहली ही फ़िल्म आशिक़ी (1990) से भारी लोकप्रियता हासिल करनेवाली अभिनेत्री अनु अग्रवाल भी इस फ़िल्म को कामयाबी की मंज़िल तक नहीं ले जा सकीं और रिटर्न ऑफ़ ज़्वैल थीफ़ उनके करियर की आखिरी रिलीज़ फ़िल्म साबित हुई।
फ़िल्म की कहानी कुछ यूँ है कि अरबपति व्यवसायी विनय कुमार (देव आनंद) द्वारा आयोजित रत्नों की एक प्रदर्शनी से बेशकीमती कोहिनूर हीरा चोरी हो गया है। विनय कुमार संकट में हैं क्योंकि अगर वो हीरा समय रहते नहीं मिला तो उनकी ज़वाहारातों की दुकान पर ब्रिटिश सरकार का कब्ज़ा हो जाएगा। फ़िल्म की कहानी मनोरंजक है और हीरे के असली चोर की पहचान को लेकर दर्शकों को उलझन में डाले रहती है, पर फ़िल्म के कई दूसरे हिस्से कमज़ोर हैं। ढाई घंटे से भी अधिक अवधि की फ़िल्म ज़रूरत से ज़्यादा ही लम्बी लगती है। हालांकि फ़िल्म कथा के रहस्य को टूटने नहीं देती लेकिन किरदारों के आपसी रिश्ते ठीक से बुने नहीं गए हैं और सबसे ख़ास धर्मेंद्र की रहस्यमय उपस्थिति समझ में ही नहीं आती है।
देव आनंद और अशोक कुमार को उनकी क्लासिक भूमिकाओं में वापस देखना इस फ़िल्म से जुड़ा सबसे बड़ा आकर्षण था, लेकिन कहना होगा कि यह फ़िल्म अपने किये वादों पर खरी नहीं उतरती। फ़िल्म की सबसे कमज़ोर कड़ी उस दौर की सफलतम संगीतकार जोड़ी जतिन-ललित का रचा फ़िल्म का संगीत रहा। आशा भोंसले, अभिजीत, कुमार सानू और अलका याग्निक जैसे नामचीन पार्श्व गायकों के गाये गीतों के बावजूद फ़िल्म के गीतों को लोकप्रियता नहीं मिली। गीतों की धुनें भी कुछ खास उल्लेखनीय नहीं थीं और पुरानी ज़्वैल थीफ़ के मुकाबले में तो एकदम फ़ीकी रहीं।
Body of Work
Research Centre
Related
3