Rajrani Meera1933
Introduction
The film followed the life of 16th-century saint-poet Mirabai (Durga Khote), whose deep devotion to Lord Krishna creates tension in her marital home. Married to the Rana of Mewar (Prithviraj Kapoor), Meera's spiritual love is misunderstood as romantic infatuation. Her in-laws subject her to various torments, including attempts on her life by her brother-in-law. Undeterred, she takes refuge in singing devotional bhajans, eventually renouncing palace life to live as a wandering mendicant-poet.
Supporting roles included Pahari Sanyal as Chand Batta, Molina Devi as Sunanda, and Indubala as Charani Kamala Devi, along with Ansari, Khatoon, Sankatha Prasad, and Siddiqui. While many devotional films focused on male saints, Meera Bai remains the most prominent female saint-poet to inspire Indian filmmakers. Even during the silent era, two versions were made in 1921 by Kanjibhai Rathod and Ramnik Desai. Other notable renditions include Ellis Duncan's Meera (1945), starring M. S. Subbulakshmi, and later versions by Kidar Sharma, Nanabhai Bhatt, and Gulzar.
The film's music became iconic, with songs like Mere To Girdhar Gopal, Baso More Nainan Mein Nandlal, and Aiso Janma Nahin Baar Baar becoming household favorites. A major success, Rajrani Meera elevated Prithviraj Kapoor and launched Chandrabati Devi as a major Bengali star.
फ़िल्म की कहानी 16वीं सदी की कृष्णभक्त कवयित्री मीराबाई (दुर्गा खोटे) के जीवन पर आधारित। कहानी के अनुसार मीरा की भगवान कृष्ण के प्रति समर्पण भरी भक्ति उनके ससुराल में तनाव उत्पन्न करती है। मेड़ता राज्य की बेटी मीरा का विवाह मेवाड़ के राणा (पृथ्वीराज कपूर) से होता है। लेकिन ससुराल में मीरा की भगवान कृष्ण के प्रति प्रेमाभाव भरी भक्ति को गलत रूप में देखा जाता है। उनके राजसी ससुराल वाले उन्हें भिन्न-भिन्न प्रकार की यातनाएँ देकर सताने का प्रयास करते हैं। ख़ासकर पति की मृत्यु के बाद राजगद्दी पर बैठे उनके देवर मीरा को जान से मारने तक का प्रयास करते हैं। पर इस सबके बावजूद मीरा भगवान के भजन गाना नहीं त्यागतीं और अंततः महलों के शाही जीवन का त्याग कर एक संन्यासी भक्त कवयित्री के रूप में अपनी ज़िन्दगी बिताती हैं।
फ़िल्म की दूसरी सहायक भूमिकाओं में पहाड़ी सान्याल चाँद भट्ट के किरदार में, मोलीना देवी सुनंदा की भूमिका में और इंदुबाला चारणी कमला देवी की भूमिका में दिखाई देती हैं। इनके साथ अंसारी, ख़ातून, संकठा प्रसाद और सिद्दीकी अन्य भूमिकाएँ निभा रहे थे। भारत में जहाँ अधिकतर भक्ति आधारित फ़िल्में पुरुष संतों पर केंद्रित होती थीं, समूचे मध्यकाल में मीराबाई अकेली ऐसी प्रमुख महिला संत कवयित्री बनकर उभरीं जिन्होंने भारतीय फ़िल्मकारों का खूब ध्यान खींचा। मूक सिनेमा युग के दौरान भी सन् 1921 में कांजीभाई राठौड़ और रामनिक देसाई जैसे निर्माता-निर्देशकों ने मीरा के जीवन पर दो फ़िल्में बनाई थीं। कृष्णभक्त मीरा के जीवनचरित्र पर बनी अन्य प्रमुख फ़िल्मों में एलिस डंकन द्वारा निर्देशित मीरा (1945) प्रमुख रही जिसमें दिग्गज शास्त्रीय गायिका एम. एस. सुब्बलक्ष्मी ने मीरा की भूमिका अदा की। बाद के सालों में किदार शर्मा, नानाभाई भट्ट और गुलज़ार ने भी कवयित्री मीरा के जीवनचरित्र पर फ़िल्मों का निर्माण किया।
सबसे ख़ास यह कि इस फ़िल्म का संगीत खूब लोकप्रिय हुआ और “मेरे तो गिरधर गोपाल”, “बसो मोरे नैनन में नंदलाल” और “ऐसो जन्म न हो बार-बार” जैसे मीरा के लिखे पद गीत बनकर घर-घर में गूँजने लगे। फ़िल्म को बड़ी व्यावसायिक कामयाबी मिली और इससे पृथ्वीराज कपूर के नायकीय कद में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। इसी फ़िल्म के बांग्ला संस्करण को मिली लोकप्रियता से चंद्रावती देवी के बांग्ला सिनेमा के एक प्रमुख सितारा बनने का मार्ग प्रशस्त हुआ।