Gopinath1948
Introduction
The story is about Mohan (Raj Kapoor), who wants to write stories for films. He is fascinated by films and eventually meets a big movie star. The actress, in turn, is charmed by his simple ways. His increasing affection for her is merely a game for the actress. His mother (Anwaribai), a heart patient, would like to see him married to Gopi (Tripti Mitra), a friend's daughter staying with them. Gopi has come from the village to Bombay with her brother, who's going to Africa for a job. On Mohan's mother's request and at Gopi's insistence, the brother departs without her. Gopi has been in love with Mohan from their childhood days in the village. Mohan is not interested in her and instead gets involved with Neela Devi (Latika), a famous film star. Gopi's one-sided devotion to Mohan drives her to madness, where she sees him everywhere. Mohan returns disenchanted by Neela.
The music was composed by Ninu Muzumdar, with lyrics by Surdas, Meerabai and Ram Moorti.
फ़िल्म की कहानी मोहन (राज कपूर) नामक युवा के साथ आगे बढ़ती है। मोहन का सपना है कि वो एक दिन फ़िल्मों के लिए कहानियाँ लिखे। उसे चमक-दमक से भरी सिनेमाई दुनिया बेहद आकर्षित करती है। अपनी इसी ख्वाहिश को पूरा करने के सिलसिले में उसकी मुलाकात एक प्रसिद्ध फ़िल्म अभिनेत्री नीला देवी (लतिका) से होती है। यह सितारा नायिका मोहन की सादगी से आकर्षित हो जाती है, लेकिन मोहन के दिल में उसके लिए तीव्र होते प्यार के जज़्बात सितारा नायिका के लिए किसी खेल की तरह हैं।
इधर दिल की बीमारी से पीड़ित मोहन की माँ (अनवरी बाई) की तमन्ना है कि उसका बेटा गोपी (पृप्ति मित्रा) से विवाह कर ले। गोपी उनके पुराने समय के एक दोस्त की बेटी है और इन दिनों शहर में उनके साथ रहने आई है। गोपी का भाई अपनी बहन के साथ गाँव से बम्बई आया है और यहाँ से नौकरी करने अफ्रीका जाने वाला है। मोहन की माँ के कहने पर जिसमें गोपी की भी सहमति है, उसका भाई उसे बम्बई में छोड़कर अकेला नौकरी करने विदेश चला जाता है। गोपी और मोहन का प्रेम बचपन के साहचर्य से उपजा प्रेम है, जिसमें गाँव में बिताये बचपन में साथ खेलने की स्मृतियाँ हैं। मगर अब मोहन की आँखों में दूसरी ही चमक है। उसे गोपी के साथ का मोह नहीं, वह तो सिनेमा सितारा नीलादेवी के आकर्षण में उलझा है। इधर गोपी का मोहन के प्रति एकतरफा समर्पण उसकी मानसिक स्थिति के लिए घातक सिद्ध होता है। प्रेमी से विरह के बिछोह में वह पागलपन में हर जगह मोहन को देखने लगती है। आखिर में मोहन का भी नीलादेवी से मोहभंग होता है, और वह वापस गोपी के पास लौट आता है। लेकिन तब तक शायद बहुत देर हो चुकी है।
इस फ़िल्म के लिए नीनू मजूमदार ने संगीत तैयार किया था और राममूर्ति के लिखे इसके गीतों के अलावा कुछ गानों में भक्त कवि सूरदास एवं मीराबाई के लिखे भजन और पद बोलों के रूप में इस्तेमाल किए गए थे। फ़िल्म में ख़ासकर शमशाद बेग़म के गाये गीत “बहुतेरो समझायो री लाखन बार” अपनी शोख़ अदाकारी और “आई सावन की रुत” अपनी चंचल अदा के लिए बहुत पसन्द किये गए।
इस फ़िल्म में निर्देशक महेश कौल ने एक फ़िल्म निर्देशक की ही दिलचस्प आत्मपरक भूमिका निभाई है। कहानी में इस फ़िल्म निर्देशक के सेट पर ही मोहन और लतिका का प्रेम संबंध परवान चढ़ता है। गोपीनाथ को हम हिन्दी सिनेमा इतिहास की उन शुरुआती फ़िल्मों में रख सकते हैं जहाँ चमक-दमक से भरा सिनेमा जगत स्वयं अपनी ओर एक आलोचकीय नज़र से देख रहा है। यह बात इस फ़िल्म को सिने इतिहास की एक धरोहर बना देती है।
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