Shree Ram Bharat Milan1965
Introduction
The narrative begins with Raja Dashrath accidentally killing a young man while hunting. The man, who had come to fetch water for his blind parents, asks Dashrath to deliver the water before he dies. When the grieving parents learn of their son's death, they curse Dashrath, setting in motion a chain of tragic events. Rani Kaikeyi invokes a promise, forcing Dashrath to exile Prince Rama for 14 years and crown her son, Bharat, instead.
Rama, accompanied by Sita and Laxman, accepts exile. After Dashrath's death, Bharat refuses the throne and seeks out Rama, who insists on fulfilling his vow. Bharat returns with Rama's sandals, placing them on the throne as a symbol of his brother's rightful rule, vowing to wait for his return.
The film climaxes with the war against Lanka's demon king, Ravan, who abducts Sita. Despite a strong cast, including Prithviraj Kapoor and Nirupa Roy, there is limited data on the film's box office performance. While not listed among the highest-grossing films of 1965, its absence from commercial rankings does not imply failure. It's worth noting that box office tracking and media documentation were far less comprehensive during that period compared to today.
इस कथानक की शुरुआत राजा दशरथ के हाथों शिकार खेलने के दौरान अनजाने में एक युवक का वध हो जाने से होती है। श्रवण कुमार नामक वह युवक अपने अंधे माता-पिता के लिए पानी लेने नदी किनारे आया था और राजा दशरथ उसे कोई मवेशी समझ शब्दवेधी बाण चला देते हैं। मरने से पहले श्रवण कुमार राजा दशरथ से अपने अंधे अशक्त माता-पिता तक पानी पहुँचाने का अनुरोध करता है। लेकिन जब उस युवक के शोकाकुल माता-पिता को अपने पुत्र की अकालमृत्यु का दुखद समाचार मिलता है तो वे राजा दशरथ को श्राप देते हैं और यहीं से एक त्रासद घटनाक्रम की शृंखला चल निकलती है। रानी कैकयी अपने पति राजा दशरथ से दिए हुए वचन के पालन का आग्रह करती हैं और दशरथ को मजबूरन अपने बड़े सुपुत्र श्रीराम को चौदह वर्षों के वनवास के लिए जाने का आदेश देना पड़ता है। राम को वनवास भेजकर वह कैकयी की इच्छानुसार पुत्र भरत को राजा बनाने का आदेश देते हैं।
राम अपनी पत्नी सीता और छोटे भ्राता लक्ष्मण के साथ वनवास को जाना स्वीकार करते हैं। लेकिन राजा दशरथ की मृत्यु के बाद भरत स्वयं सिंहासन पर बैठने से करने से इनकार कर देते हैं और राम को लिवाने के लिए वन जाते हैं। पर श्रीराम पिता को दिये वचन को निभाने पर अडिग हैं। ऐसे में भरत राम की खड़ाऊँ लेकर अयोध्या लौटते हैं और उन्हें ही सिंहासन पर विराजमान करते हैं। यह खड़ाऊँ प्रतीक बन जाती है कि असली शासन प्रभु श्रीराम का है और भरत उनके लौटने भर तक प्रतीक्षा करने के लिए यह ज़िम्मेदारी संभाल रहे हैं।
फ़िल्म के कथानक का चरम लंका के राजा रावण के साथ श्रीराम का युद्ध है। रावण ने श्रीराम की पत्नी सीता का हरण किया था। पृथ्वीराज कपूर और निरूपा रॉय जैसे ख्यातिप्राप्त कलाकारों के अभिनय के बावजूद इस फ़िल्म के व्यावसायिक प्रदर्शन से जुड़ी जानकारी सीमित ही है। यह फ़िल्म सन् 1965 की सर्वाधिक कमाई करने वाली फ़िल्मों की सूची में नहीं थी। पर इससे इसका व्यावसायिक रूप से असफल होना नहीं साबित होता। ध्यान रखना चाहिए कि उस दौर में टिकट खिड़की पर किसी फ़िल्म की सटीक कमाई की जानकारी और उसका मीडिया दस्तावेज़ीकरण बहुत सीमित मात्रा में होता था।
Body of Work
Research Centre
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