Introduction
Though detailed information about the plot is limited, Golibar is known to have been a musical silent film inspired by a legend from the Shahnama. It tells the tragic love story of the Persian sculptor Farhad, who falls in love with Queen Shirin. Shah Khusro, also in love with Shirin, sets Farhad an impossible task: to carve through Mount Bisutun in exchange for Shirin's hand. Farhad's devotion ends in tragedy, and he is ultimately reunited with Shirin in death.
Despite its artistic ambition and mythological source, Golibar did not achieve major success, especially when compared to Alam Ara, which became a historic hit and ushered in the sound era. Golibar was one of three films released that year by producer B.P. Mishra, alongside Toofan and Toofani Taruni.
Director Bhagwati Prasad Mishra (1896–1932), born and educated in Benares, was a multifaceted artist, photographer, painter, and filmmaker. He apprenticed with painter Hussain Bux, worked in theatre with the Vyakul Bharat Natak Mandali, and began in film as a poster designer at Star Film. His debut, Razia Begum, caused controversy in Hyderabad. Mishra later worked with Ardeshir Irani's major studios and founded Indian Pic. Corp. and Zarina Pics. Known for emphasising visual storytelling over dialogue, his contributions are regarded as pioneering in early Indian silent cinema.
हालाँकि इस फ़िल्म की कहानी के बारे में विस्तार से सूचनाएँ उपलब्ध नहीं है फिर भी इतना पता चलता है कि गोलीबार एक संगीतमय मूक फिल्म थी जिसका कथानक शाहनामा में वर्णित 'शीरीं-फ़रहाद' की प्रसिद्ध कथा से लिया गया था। फ़रहाद फ़ारस का रहनेवाला एक मूर्तिकार था और राजकुमारी शीरीं अर्मेनिया के राजा की बेटी थी। फ़िल्म इनकी जगप्रसिद्ध दुखांत प्रेम कहानी पर आधारित है। कहानी में शीरीं के प्यार में पागल फ़ारस का शाह खुसरो फ़रहाद को अपने रास्ते से हटाने के लिए उसके सामने एक असंभव शर्त रखता है। शर्त यह है कि अगर फ़रहाद बेहिस्तून के पहाड़ों काटकर रास्ता बना दे तो शीरीं उसकी हो सकती है। हर पल शीरीं का नाम जपता फ़रहाद दीवानों की तरह पहाड़ों को तराशने में लग जाता है। पर शीरीं-फ़रहाद की यह प्रेम-कहानी भी ऐसी ही अन्य अमर प्रेम-कहानियों की तरह आखिर में त्रासदी पर ख़त्म होती है और फ़रहाद से शीरीं का मिलन जान देकर ही हो पाता है।
हालाँकि इस फ़िल्म की कलात्मक महत्वाकांक्षाएँ बड़ी थीं और यह एक जनलोकप्रिय प्रेमाख्यान को कथानक के बतौर इस्तेमाल कर रही थी पर गोलीबार को ख़ास व्यावसायिक कामयाबी हासिल नहीं हो पाई। विशेष तौर पर आलम आरा (1931) को मिली ऐतिहासिक सफलता से तुलना करें तो यह फ़िल्म पीछे रह गई। सिनेमा की दुनिया बोलती फ़िल्मों की ओर मुड़ गई थी। उस वर्ष निर्माता-निर्देशक भगवती प्रसाद मिश्रा की तीन फ़िल्में रिलीज़ हुई थीं जिनमें तूफ़ान (1931) और तूफ़ानी तरुणी (1931) शामिल थीं।
इस फ़िल्म के निर्देशक भगवती प्रसाद मिश्रा (1896-1932) का जन्म और शुरुआती शिक्षा-दीक्षा बनारस में हुई थी। मिश्रा एक बहुआयामी कलाकार थे। एक फ़ोटोग्राफ़र और चित्रकार के रूप में करियर की शुरुआत करने के बाद वे फ़िल्मों की दुनिया में आये। उन्होंने चित्रकार हुसैन बख़्श से चित्रकला का प्रशिक्षण हासिल किया था और 'व्याकुल भारत नाटक मण्डली' के साथ रंगमंच किया था। इसके बाद 'स्टार फ़िल्म' के साथ एक पोस्टर डिज़ाइनर की भूमिका में उन्होंने फ़िल्म जगत में प्रवेश किया। उनकी पहली निर्देशित फ़िल्म रज़िया बेग़म (1924) हैदराबाद राज्य में सांप्रदायिक विवाद खड़े होने की वजह बनी थी। बाद में उन्होंने अर्देशिर ईरानी के साथ उनके स्टूडियोज़ में भी काम किया और 'इंडियन पिक्चर कॉर्पोरेशन' तथा 'ज़रीना पिक्चर्स' की स्थापना की। संवादों से ऊपर दृश्यों को प्रधानता देनेवाली शैली को भारतीय सिनेमा में स्थापित करने वाले मिश्रा को आरंभिक दौर के भारतीय मूक सिनेमा के अग्रणी फ़िल्मकारों में से एक गिना जाता है।
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