Agantuk (The Stranger, 1991) The film stands as the final cinematic testament of Satyajit Ray, the legendary auteur whose voice, some say, shaped the soul of Indian cinema. This Bengali-language drama, adapted from Ray’s own short story Atithi, is not merely a film but a philosophical reverie—one that asks more than it answers, nudging the viewer gently but unflinchingly toward self-inquiry and the crumbling façades of societal constructs. Crafted with the quiet elegance that marked Ray's oeuvre, Agantuk is a meditative fable wrapped in the garments of everyday life. A joint Indo-French production, it was made possible with support from international collaborators, including Gérard Depardieu’s DD Productions and Canal+. And in a moment both intimate and historic, Ray himself lends his voice to the film for the first and only time—chanting the 108...
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आगंतुक (1991) महान निर्देशक सत्यजित राय की यह अन्तिम फ़िल्म उनके सिनेमाई सफ़र का अन्त नहीं बल्कि उनकी विचारशृंखला का सार कही जानी चाहिए। एक शांत, दार्शनिक चिंतनशील फ़िल्म जो उत्तर देने से अधिक सवाल खड़े करती है और दर्शक को समाज के जड़ चरित्र और उसके बनावटीपन पर सोचने के लिए मजबूर करती है। बांग्ला भाषा में बनी यह फ़िल्म राय की खुद की “अतिथि” शीर्षक से लिखी कहानी पर आधारित है। इसे केवल एक कहानी भर नहीं बल्कि एक बौद्धिक वैचारिकी के खाते में रखा जा सकता है। ऐसी वैचारिकी जो इंसानी जिज्ञासा और सांसारिकता के खोखलेपन को एक ही तराजू में रखकर परखती है। निर्देशक सत्यजित राय की शैली की पहचान रही बारीक़ नज़र और सादगी से रची यह फ़िल्म रोजमर्रा के जीवन की कथा कहती है, लेकिन उसे दर्शन की ऊँचाई देती है। इस फ़िल्म का निर्माण एक संयुक्त इंडो-फ़्रेंच प्रोडक्शन के तहत हुआ था जिसके पीछे अंतरराष्ट्रीय सहयोग था। जेरार्ड डेपार्दियू का ‘डीडी प्रोडक्शन्स’ और ‘कनाल प्लस’ इसके निर्माताओं में शामिल थे। इस फ़िल्म की एक और ख़ास बात ये है कि इसमें सत्यजित राय ने पहली और आखिरी बार अपनी आवाज़ दी है। वे श्रीकृष्ण के 108 नामों का जाप करते हुए सुनाई पड़ते हैं। यह सिनेमा के पर्दे पर उनका अन्तिम और सबसे निजी...
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